उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ruka sa tha koi manzar magar Thahra nahin tha

रुका सा था कोई मंज़र मगर ठहरा नहीं था

رکا سا تھا کوئی منظر مگر ٹھہرا نہیں تھا

शायर: Yasir Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रुका सा था कोई मंज़र मगर ठहरा नहीं था
लरज़ती याद का आँसू था और बहता नहीं था

समझते थे वो कम-आमेज़ी-ए-दरवाज़ा-ए-दिल
बहुत दस्तक थी लेकिन ज़ख़्म-ए-आवाज़ा नहीं था

बसारत में किसी नादीदा वहशत की रड़क थी
भटकती आँख में किस दश्त का टुकड़ा नहीं था

सबा हमराह-ए-सत्ह-ए-आब मैं बहता कहाँ तक
तमन्ना घुल रही थी और बदन सच्चा नहीं था

खुला फिर रात के कोहरे पे आख़िर रात खो कर
हवा के हाथ में जो 'अक्स था उस का नहीं था

सुलगती रात की रानी लपट की आस में थी
बुझी रुत की हथेली पर दिया खिलता नहीं था

हमी बेताब थे ज़र्रे का तारा तापते थे
ख़ुदा के आइने में कौन सा सहरा नहीं था