उर्दू शायरी · ग़ज़ल

roz sar-e-rah us ka milna mumkin hai majburi ho

रोज़ सर-ए-राह उस का मिलना मुमकिन है मजबूरी हो

روز سر راہ اس کا ملنا ممکن ہے مجبوری ہو

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रोज़ सर-ए-राह उस का मिलना मुमकिन है मजबूरी हो
लेकिन अब तो यूँ लगता है जैसे बहुत ज़रूरी हो

दिल पर बादल सा बरसा है उस की साँवली रंगत का
मौसम के खुलने पर देखें दूरी हो कि हुज़ूरी हो

वस्ल की 'अर्ज़ी पर वो ग़ौर अब कर ही लें तो बेहतर है
क्या मा'लूम कहाँ होंगे हम जब उस की मंज़ूरी हो

गुमनामी के जीने से उस पर मर जाना अच्छा है
हम भी किसी शुमार में आएँ अपनी भी मश्हूरी हो

काम न जिस दिन मिले हमारा चूल्हा ठंडा रहता है
रोज़गार ही अपना अगर मोहब्बत की मज़दूरी हो

सारे शह्र से बद-गुमाँ तो हो नहीं सकता वो लेकिन
कुछ कोशिश तो करनी चाहिए पूरी हो कि अधूरी हो

इक दिन सो कर उट्ठें तो नक़्शा ही कुछ ऐसा हो 'ज़फ़र'
नीलो नील ज़मीं की रंगत आसमान की भूरी हो