उर्दू शायरी · ग़ज़ल

roz roz ye lambi tan ke sona aur na hona

रोज़ रोज़ ये लम्बी तान के सोना और न होना

روز روز یہ لمبی تان کے سونا اور نہ ہونا

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रोज़ रोज़ ये लम्बी तान के सोना और न होना
कब का हुआ बराबर अपना होना और न होना

एक ही वक़्त में दोनों बातें क्यूँ-कर हो सकती हैं
या'नी शाम किनारे बैठ के रोना और न होना

सब का ढूँढते रहना वो बे-सूद यहीं हर जानिब
अपने आप को इसी भीड़ में खोना और न होना

जैसे दो रंगों का मिलना और मिट जाना मिल कर
होने को किसी अन-होने में समोना और न होना

मैल की सूरत रहना अपने पहने हुए कपड़ों में
और फिर उन को कहीं उतार के धोना और न होना

शाम और शह्र के साथ ही धुंद में गुम हो जाना अक्सर
उस की दीद से आँखें रोज़ भिगोना और न होना

बिक जाना बाज़ार-ए-ख़याल में पूरी क़ीमत ले कर
सोचते जाना उस के जिस्म का सोना और न होना

रुक जाना लहरों का सारा शोर 'ज़फ़र' उस लम्हे
ख़्वाब समुंदर में ख़ुद को वो डुबोना और न होना