उर्दू शायरी · ग़ज़ल

reh reh ke yaad aati hai us sharmsar ki

रह रह के याद आती है उस शर्मसार की

رہ رہ کے یاد آتی ہے اس شرمسار کی

शायर: Ibrahim Ali Zeeshan5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रह रह के याद आती है उस शर्मसार की
बे-इख़्तियारी देख मिरे इख़्तियार की

डर है कि गिर न जाए मोहब्बत का आशियाँ
मिट्टी खिसक रही है मिरे ए'तिबार की

मुरझा रहा है दिल में तिरी याद का दरख़्त
क्या धूप पड़ रही है तिरे इंतिज़ार की

इक तुझ को देखना ही मिरा काम काज था
क्यों धज्जियाँ उड़ा दीं मिरे रोज़गार की

वो शख़्स आ के मेरे महल्ले में बस गया
मुझ पर निगाह पड़ गई परवरदिगार की