उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rashk se ghairon ke ji khote hain hum

रश्क से ग़ैरों के जी खोते हैं हम

رشک سے غیروں کے جی کھوتے ہیں ہم

शायर: Dagh Dehlvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रश्क से ग़ैरों के जी खोते हैं हम
क्या बुरों की जान को रोते हैं हम

बे-ख़ुदाना अपनी हुश्यारी रही
जागते हैं कुछ तो कुछ सोते हैं हम

अपने घर रहने दे क्यों कर हूर-वश
हज़रत-ए-आदम ही के पोते हैं हम

जाँ-कनी अपना है काम ऐ कोहकन
इश्क़ में पत्थर नहीं ढोते हैं हम

'दाग़' है किस को मयस्सर दर्द-ए-इश्क़
रंज होता है तो ख़ुश होते हैं हम