उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rasan-o-dar se ya ku-e-butan se uTThe

रसन-ओ-दार से या कू-ए-बुताँ से उट्ठे

رسن و دار سے یا کوئے بتاں سے اٹھے

शायर: Chandra Parkash Jauhar Bijnauri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रसन-ओ-दार से या कू-ए-बुताँ से उट्ठे
फ़ित्ना हर हाल में फ़ित्ना है जहाँ से उट्ठे

कितने जाँ-सोज़ ओ दिल-आवेज़ हैं वो नग़्मे भी
शो'ला बन कर जो मिरे हुस्न-ए-बयाँ से उट्ठे

दोनों आलम में कहीं उन को ठिकाना न मिला
जो तिरी बज़्म से उट्ठे वो जहाँ से उट्ठे

हाए वो नाले कि जो अर्श-ए-बरीं तक पहुँचे
उफ़ वो तूफ़ाँ जो मिरे अश्क-ए-रवाँ से उट्ठे

कशिश-ए-हुस्न ने इक गाम भी चलने न दिया
फिर वहीं बैठ गए लोग जहाँ से उट्ठे

काम कुछ कर न सका वाइज़-ए-नादाँ का तिलिस्म
कितने तूफ़ाँ मिरी ख़ामोश फ़ुग़ाँ से उट्ठे

इन हिजाबात की अज़्मत को कहूँ क्या 'जौहर'
जो यक़ीं बन के मिरे वहम-ओ-गुमाँ से उट्ठे