उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rangon ka tamannai na saudai hun ras ka

रंगों का तमन्नाई न सौदाई हूँ रस का

رنگوں کا تمنائی نہ سودائی ہوں رس کا

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रंगों का तमन्नाई न सौदाई हूँ रस का
नश्शा है मिरे ख़ूँ में अभी मौत के मस का

बैठा हूँ किसी और सदा के लिए वर्ना
गुज़रा है मिरे सर से भी आवाज़ा जरस का

है रूह का शब शोर तलातुम तो बड़ी चीज़
ये जिस्म का जोहड़ ही नहीं है मिरे बस का

बहता हुआ पत्ता था कोई मौज-ए-रवाँ पर
चढ़ता हुआ सर में कोई दरिया था हवस का

निकला हूँ नया हो के समुंदर के सफ़र पर
पेशानी से हर दाग़ धुला पिछले बरस का

इस तरह 'ज़फ़र' सब को हवा क़ैद करेगी
देगा न दिखाई कहीं दरवाज़ा क़फ़स का