उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rakkha nahin tha tu ne mera dil sanbhaal kar

रक्खा नहीं था तू ने मिरा दिल सँभाल कर

رکھا نہیں تھا تو نے مرا دل سنبھال کر

शायर: Ibrahim Ali Zeeshan6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रक्खा नहीं था तू ने मिरा दिल सँभाल कर
अब कुछ न कर सकेगा लिहाज़ा मलाल कर

रक़्साँ थी शब को धूप तुम्हारे ख़याल की
फ़ुर्सत का चाँद बैठ गया दिल सँभाल कर

बाहर निकल के देख अँधेरों से एक बार
रक्खा है रौशनी ने कलेजा निकाल कर

कहते हैं दिल जिसे कहीं मौजूद ही नहीं
देखा है मैं ने बारहा सीना खँगाल कर

बाब-ए-क़फ़स खुला था रिहा तब न हो सके
अब क्या करें ज़मीन से रस्ता निकाल कर

आई थी इतनी याद तिरे जिस्म की महक
हम चूमने लगे तिरे कपड़े निकाल कर