उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rahi agarche na mujhko kabhi rulae baghair

रही अगरचे न मुझ को कभी रुलाए बग़ैर

رہی اگرچہ نہ مجھ کو کبھی رلائے بغیر

शायर: Jaleel Qidwai8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रही अगरचे न मुझ को कभी रुलाए बग़ैर
क़रार दिल को नहीं तेरी याद आए बग़ैर

कोई ये हुस्न की देखे तो शान-ए-बे-ताबी
रहा गया न मिरे दिल में उन से आए बग़ैर

हँसा हँसा के मुझे और ख़ुद भी हँस हँस कर
रहे न ख़ाक में मेरा वो दिल मिलाए बग़ैर

अगरचे शर्म ने कहने दिया न कुछ मुँह से
रहे न आह पे मेरी वो सर उठाए बग़ैर

कमाल-ए-जज़्ब-ए-मोहब्बत से दास्ताँ मेरी
तिरी ज़बाँ पे है मेरी ज़बाँ पे आए बग़ैर

गुदाज़-ए-क़ल्ब वो ने'मत है जो नहीं मिलती
बशर को आँख से ख़ून-ए-जिगर बहाए बग़ैर

जला के आतिश-ए-ग़म से इसे बना इक्सीर
कि संग-ओ-ख़िश्त से बद-तर है दिल जलाए बग़ैर

ये राज़ वो है जिसे मैं ही जानता हूँ 'जलील'
कि दिल में वो उतर आए नज़र में आए बग़ैर