उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rah rah ke zabani kabhi tahrir se humne

रह रह के ज़बानी कभी तहरीर से हम ने

رہ رہ کے زبانی کبھی تحریر سے ہم نے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रह रह के ज़बानी कभी तहरीर से हम ने
क़ाइल किया उस को इसी तदबीर से हम ने

किस सम्त लिए जाते हो और क्या है इरादा
पूछा न कभी अपने इनाँ-गीर से हम ने

दिल पर कोई क़ाबू न रहा जब तो किसी तौर
बाँधा है ये वहशी तिरी ज़ंजीर से हम ने

हर बार मदद के लिए औरों को पुकारा
या काम लिया ना'रा-ए-तकबीर से हम ने

बेहतर है कि अब काम कोई और किया कर
ये भी न कहा कातिब-ए-तक़दीर से हम ने

अपनी ही करामात दिखाते रहे सब को
सरक़ा न किया मो'जिज़ा-ए-'मीर' से हम ने

तख़रीब तो करते रहे सौ तरह की लेकिन
ये काम किया जज़्बा-ए-ता'मीर से हम ने

अब देखिए क्या इस का निकलता है नतीजा
माथा है लगाया हुआ तासीर से हम ने

वो बाम-ए-तमाशा हुआ ग़ाएब तो 'ज़फ़र' आज
लटका लिया ख़ुद को किसी शहतीर से हम ने