उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rah jati hai bas bich mein hi baat hamari

रह जाती है बस बीच में ही बात हमारी

رہ جاتی ہے بس بیچ میں ہی بات ہماری

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रह जाती है बस बीच में ही बात हमारी
कुछ इस से ज़ियादा नहीं औक़ात हमारी

बाहर तो किसी तौर बदलता नहीं मौसम
अन्दर ही गिरा करती है बरसात हमारी

हम अपनी ही ज़द से कभी निकले नहीं बाहर
होती रहीं ख़ुद पर ही 'इनायात हमारी

उतरा था अभी एक अंधेरा सा लहू में
और चारों तरफ़ फैल गई रात हमारी

तन्हाई के हाथों कभी हो जाते हैं दिल-तंग
रखती है परेशाँ कहीं बोहतात हमारी

पोशीदा 'ज़फ़र' आप से भी क्या है यहाँ पर
जिस तरह की होती है मुदारात हमारी