उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raat phir jaanib-e-sahar aai

रात फिर जानिब-ए-सहर आई

رات پھر جانب سحر آئی

शायर: Ghalib Ahmad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रात फिर जानिब-ए-सहर आई
कितनी दुश्वार रहगुज़र आई

चाँद तारों के फूल मुरझाए
जब भी शबनम की आँख भर आई

हसरतों का सफ़ेद-फ़ाम कफ़न
कौन पहने हुए किधर आई

किस तमन्ना की चश्म-ए-आवारा
ठोकरें खा के दर-ब-दर आई

आज रंग-ए-शफ़क़ अजीब सा था
दिल की तस्वीर सी उतर आई

इक ज़माना हुआ ख़िज़ाँ गुज़रे
दिल उजड़ने की अब ख़बर आई

क्या हुआ दिल की आबरू न रही
ज़िंदगी कुछ तो राह पर आई