उर्दू शायरी · ग़ज़ल

barha ho ke gae abr-e-bahaaran Khaali

बारहा हो के गए अब्र-ए-बहाराँ ख़ाली

بارہا ہو کے گئے ابر بہاراں خالی

शायर: Ghalib Ahmad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बारहा हो के गए अब्र-ए-बहाराँ ख़ाली
दश्त में फूल खिले और गुलिस्ताँ ख़ाली

अब तो ख़ल्वत-ए-कदा-ए-आलम-ए-इम्काँ से निकल
अब यहाँ कोई नहीं इश्क़ का उनवाँ ख़ाली

फिर किसी जन्नत-ए-गुम-गश्ता को देखा उस ने
जिस्म फिर छोड़ चला जिस्म का ज़िंदाँ ख़ाली

वादि-ए-ज़ीस्त में दिल ढूँढता है नूर का रंग
चार सू घूरती है चश्म-ए-परेशाँ ख़ाली

ऐ सबा अब तू यहाँ कोई नया फूल खिला
एक मुद्दत से है दामान-ए-ग़ज़ल-ख़्वाँ ख़ाली