उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jism jab mail-e-parwaz-e-digar hota hai

जिस्म जब माइल-ए-परवाज़-ए-दिगर होता है

جسم جب مائل پرواز دگر ہوتا ہے

शायर: Ghalib Ahmad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस्म जब माइल-ए-परवाज़-ए-दिगर होता है
मंज़िल-ए-शौक़ को फिर मेरा सफ़र होता है

साहिल-ए-होश पे है दर्द की दीवार अज़ीम
आँख झपकाओ तो दीवार में दर होता है

दिल समझता है कि लो आ गई मंज़िल अपनी
क़ाफ़िला याद की वादी में मगर होता है

दिल ने इस वादी-ए-वीरान को क्यों अपनाया
ऐसी सुनसान जगह भी कोई घर होता है

कौन जाने कि यहाँ वो कभी मिलने आए
कौन जाने कि यहाँ उस का गुज़र होता है