उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya kare qaidi-e-zindan-e-KHayal

क्या करे क़ैदी-ए-ज़िंदान-ए-ख़याल

کیا کرے قیدیٔ زندان خیال (ردیف .. ی)

शायर: Ghalib Ahmad6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या करे क़ैदी-ए-ज़िंदान-ए-ख़याल
ताब-ए-आवाज़-ए-सलासिल न रही

जब तिरी याद ने घर छोड़ दिया
जुस्तुजू की कोई मंज़िल न रही

बुझ गया शहर गए रात के लोग
इक रमक़ थी सर-ए-महफ़िल न रही

हम तिरे साथ रहे पास रहे
तेरी क़ुर्बत हमें हासिल न रही

अब तिरा ग़म भी तुझे सौंप दिया
अब कोई बात भी मुश्किल न रही

अब तिरी याद में जी लगता है
ज़िंदगी जब किसी क़ाबिल न रही