उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raegan jati na kyun phir hama-koshi uski

राएगाँ जाती न क्यूँ फिर हमा-कोशी उस की

رائیگاں جاتی نہ کیوں پھر ہمہ کوشی اس کی

शायर: Parwez Rahmani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

राएगाँ जाती न क्यूँ फिर हमा-कोशी उस की
थी ग़रज़-कार बहुत हल्क़ा-ब-गोशी उस की

हर तरफ़ उस ने दिया जिस्म-नुमाई को रिवाज
ख़ूब मशहूर हुई साया-फ़रोशी उस की

बर-सर-ए-आम मिरी चुप की जो तश्हीर हुई
मुश्तइ'ल हो उठी आवाज़-बगोशी उस की

मुनअ'किस हो न सकी कोई भी सूरत उस से
या'नी बे-कार गई आइना-पोशी उस की

आ गया वो मिरी ख़ुर्शेद-पनाही के तले
मुझ से देखी न गई ख़ाना-बदोशी उस की

बे-फ़रिश्ता हुआ कब शाना ख़बर तक न हुई
मुझ पे तारी थी कुछ इस तरह बे-होशी उस की

ख़ास कर लीजिए 'परवेज़' का सानी कोई
आम होने को है दिल-दोज़ ख़मोशी उस की