उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qarar par na milo iztirab ho ki na ho

क़रार पर न मिलो इज़्तिराब हो कि न हो

قرار پر نہ ملو اضطراب ہو کہ نہ ہو

शायर: Pandit Daya Shankar Naseem Lakhnawi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़रार पर न मिलो इज़्तिराब हो कि न हो
शराब ग़ैर को दो दिल कबाब हो कि न हो

फँसा है जिस के ग़म-ओ-पेच में हमारा दिल
वो ज़ुल्फ़ ग़ैर छुए पेच-ओ-ताब हो कि न हो

गुलाबी आँखों से साक़ी की दिल बचे क्यूँकर
शराबियों में जो बैठे ख़राब हो कि न हो

कहाँ तक अश्क से आए न बू-ए-दाग़-ए-जिगर
अरक़ गुलों का जो खींचो गुलाब हो कि न हो

कमाल क्यों कि न हो दिल को काहिश-ए-ग़म में
हिलाल जब कि हुआ माहताब हो कि न हो

वो माह महर से आए तो रश्क क्या ऐ चर्ख़
कभी क़िरान-ए-मह-ओ-आफ़्ताब हो कि न हो

शुआ-ए-महर की सूरत है ताब-ए-आरिज़-ए-यार
नज़र ठहर नहीं सकती नक़ाब हो कि न हो

गया जो तालिब-ए-चाह-ए-ज़कन दिल-ए-बेताब
कुएँ पे तिश्ना-लब आता है आब हो कि न हो

अगरचे दिल नहीं लेकिन मैं आहें भरता हूँ
सबक़ तो नोक-ए-ज़बाँ है किताब हो कि न हो

न बोसा-ए-लब-ए-जाँ-बख़्श दो जो कर के सवाल
तो ज़िंदगानी से गोया जवाब हो कि न हो

'नसीम' ग़ुंचा-दहानों से बोसा क्यों माँगा
करो जो बात ही ऐसी इताब हो कि न हो