उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qamar han mein badli nahin rafta-rafta

'क़मर' हाँ में बदली नहीं रफ़्ता-रफ़्ता

قمرؔ ہاں میں بدلی نہیں رفتہ رفتہ

शायर: Qamar Malal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'क़मर' हाँ में बदली नहीं रफ़्ता-रफ़्ता
कि हम से खुला वो हसीं रफ़्ता-रफ़्ता

गली में टहलने को निकला था कल वो
मकानों से निकले मकीं रफ़्ता-रफ़्ता

मज़ा कुछ तो आए बिछड़ने का हम को
बढ़ा चाह ऐ हमनशीं रफ़्ता-रफ़्ता

सो इक एक मुनकिर ने रख दी बिल-आख़िर
तिरे आशियाँ पर जबीं रफ़्ता-रफ़्ता

किसी का न एहसाँ उठाया कि हम तो
हुए ख़ाक अपने तईं रफ़्ता-रफ़्ता

हुआ तीर पैवस्त-ए-जाँ धीरे-धीरे
हुई आँख वो सुर्मगीं रफ़्ता-रफ़्ता

चले बर्क़-रफ़्तारी से सू-ए-अफ़्लाक
किया आसमाँ को ज़मीं रफ़्ता-रफ़्ता