उर्दू शायरी · ग़ज़ल

karta hun bin tere yunhi aksar guzar-basar

करता हूँ बिन तिरे यूँही अक्सर गुज़र-बसर

کرتا ہوں بن ترے یوںہی اکثر گزر بسر

शायर: Qamar Malal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

करता हूँ बिन तिरे यूँही अक्सर गुज़र-बसर
जैसे किसी ग़रीब की बे-ज़र गुज़र-बसर

दुनिया का हर त'आम मयस्सर है चंद को
और बा'ज़ की है नान-ए-जवीं पर गुज़र-बसर

पहले जो क़ैस के लिए उठते थे आज-कल
उन पत्थरों की है मिरे सर पर गुज़र-बसर

लगता है फिर क़रीब हैं फ़ाक़ों के रोज़-ओ-शब
होती है चंद रोज़ से बेहतर गुज़र-बसर

इक शख़्स ऐसा चाहिए मुझ को भी इन दिनों
जिस के बिना न हो सके पल-भर गुज़र-बसर

हर दिल सनम-कदा है यहाँ पर 'क़मर-मलाल'
करते हो तुम ही एक ख़ुदा पर गुज़र-बसर