उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nahin hai yun ki faqat raat hi nahin kaTni

नहीं है यूँ कि फ़क़त रात ही नहीं कटनी

نہیں ہے یوں کہ فقط رات ہی نہیں کٹنی

शायर: Qamar Malal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नहीं है यूँ कि फ़क़त रात ही नहीं कटनी
तिरे बग़ैर तो ये ज़िंदगी नहीं कटनी

ख़ुशी के दिन तो गुज़रने हैं चंद लम्हों में
घड़ी कोई भी मगर दुख-भरी नहीं कटनी

बनेगी बात चराग़-ए-ख़ुदी के जलने से
पराई आग से ये तीरगी नहीं कटनी

है बे-ख़ुदी से 'इबारत ये ज़िंदगी ऐ दोस्त
बग़ैर साग़र ओ बे-शा'इरी नहीं कटनी

रहेगी उस के पलटने की आरज़ू जब तक
क़मर 'मलाल' तिरी बे-कली नहीं कटनी