उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qadam qadam pe andhera hai kya kiya jae

क़दम क़दम पे अंधेरा है क्या किया जाए

قدم قدم پہ اندھیرا ہے کیا کیا جائے

शायर: Onkar Gulshan5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़दम क़दम पे अंधेरा है क्या किया जाए
नज़र से दूर सवेरा है क्या किया जाए

जहाँ पे ठहरे हैं उस गाँव का ये 'आलम है
हर एक शख़्स लुटेरा है क्या किया जाए

जिन्हें मदद की ज़रूरत है आज-कल यारो
उन्हीं पे ज़ुल्म का घेरा है क्या किया जाए

जहाँ पे न्याय की उम्मीद ले के आए हैं
वो ही ठगों का सा डेरा है क्या किया जाए

जिधर भी जाओ सियासत ने उस तरफ़ 'गुलशन'
हवा में ज़हर बिखेरा है क्या किया जाए