उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHuda jaane kis jurm ki ye saza hai

ख़ुदा जाने किस जुर्म की ये सज़ा है

خدا جانے کس جرم کی یہ سزا ہے

शायर: Onkar Gulshan6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुदा जाने किस जुर्म की ये सज़ा है
बहारों में काँटों से दामन भरा है

समझते हैं हम धमकियाँ देने वालो
किसी दोस्त का ही इशारा हुआ है

जो मिल मिल के हम से दग़ा कर रहे हैं
उन्हीं पर हमें ए'तिबार आ रहा है

ग़मों से उलझने का है नाम जीना
बुज़ुर्गों से अक्सर ये मैं ने सुना है

वफ़ा की नहीं जिन से उम्मीद मुझ को
उन्हीं दोस्तों पर भरोसा किया है

ऐ 'गुलशन' वो समझेगा क्या राज़-ए-गुलशन
जो गुलशन में काँटों से बच कर चला है