उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kitne jismon pe nahin aaj bhi kapDa koi

कितने जिस्मों पे नहीं आज भी कपड़ा कोई

کتنے جسموں پہ نہیں آج بھی کپڑا کوئی

शायर: Onkar Gulshan6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कितने जिस्मों पे नहीं आज भी कपड़ा कोई
इस समस्या पे तो आयोग न बैठा कोई

बात कुर्सी की बहुत गर्म है चौराहों पर
डूबते गाँव की करता नहीं चर्चा कोई

चोर बनता नहीं बच्चा तो भला क्या बनता
जब खिलौना नहीं बाज़ार में सस्ता कोई

इस नए दौर के लोगों को दिखाने के लिए
दर्द पर डाल दो मुस्कान का पर्दा कोई

यूँ भटकती हुई मिलती है ग़रीबी अक्सर
जिस तरह भीड़ भरे शहर में अंधा कोई

जब तलक भूक का उपचार न होगा 'गुलशन'
पाठशाला में न पढ़ पाएगा बच्चा कोई