उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qafiye ki band galiyon ka gadagar kar diya

क़ाफ़िए की बंद गलियों का गदागर कर दिया

قافیے کی بند گلیوں کا گداگر کر دیا

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़ाफ़िए की बंद गलियों का गदागर कर दिया
उस ने कैसे काम पर मुझ को मुक़र्रर कर दिया

हम कई थे और हमारे रास्ते भी थे कई
वो अकेला था सो उस ने मा'रका सर कर दिया

जिस ने चोरी की थी सौ पच्चास पर छोड़ा उसे
जो सड़क पर जा रहा था उस को अन्दर कर दिया

छत ज़मीं पर आ रही नाज़ुक थे शहतीर इस क़दर
गिर पड़ी दीवार भी ऐसा पलसतर कर दिया

रौशनी अब राह से भटका भी देती है मियाँ
उस की आँखों की चमक ने मुझ को बे-घर कर दिया

झूठ-मूठ आख़िर गले मिल कर ब-ज़ो'म-ए-ख़ुद 'ज़फ़र'
अगला पिछ्ला सब हिसाब उस ने बराबर कर दिया