उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qafiya par qafiya hazrat raqam karte gae

क़ाफ़िया पर क़ाफ़िया हज़रत रक़म करते गए

قافیہ پر قافیہ حضرت رقم کرتے گئے

शायर: Tahir Saood Kiratpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़ाफ़िया पर क़ाफ़िया हज़रत रक़म करते गए
ओर ग़ज़ल के हाथ-पैरों को क़लम करते गए

वैसे वैसे सब अज़ीज़ों के चहेते हो गए
जैसे जैसे चाय-पानी मोहतरम करते गए

सम्त-ए-मंज़िल चलते चलते पाँव रोके बार बार
उस के ता'ने रोज़ लेकिन ताज़ा-दम करते गए

क्या बताएँ आप को उन की करम-फ़रमाइयाँ
हम इनायत और वो हम पर सितम करते गए

जब सुख़न-फ़हमों की कम-फ़हमी से वाक़िफ़ हो गए
दिन-ब-दिन हम शेर-गोई कम से कम करते गए

जबकि रुस्वाई मिला हर ख़ैर-ख़्वाही का बदल
ख़ैर-ख़्वाही फिर भी हम हर हर क़दम करते गए