उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qafiya chahiye khane ke liye

क़ाफ़िया चाहिए खाने के लिए

قافیہ چاہیئے کھانے کے لیے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़ाफ़िया चाहिए खाने के लिए
या'नी मतले' में खपाने के लिए

ख़ोशा-चीनों को ख़बर है शायद
मैं कमाता हूँ लुटाने के लिए

सब से पहले सुनी उस ने मिरी बात
बज़्म से मुझ को उठाने के लिए

मुफ़्त में उस से लड़ाई ले ली
कोई पहुँचा न छुड़ाने के लिए

हुआ ईजाद ख़ुशी का टीका
ग़म की मीआ'द बढ़ाने के लिए

कुछ हवा चाहिए आख़िर मुझ को
साँस का संख बजाने के लिए

कुछ फ़ज़ा की भी ज़रूरत है मुझे
अपनी बे-पर की उड़ाने के लिए

टूट जाने के लिए जुड़ता हूँ
शे'र लिखता हूँ मिटाने के लिए

शा'इरी अस्ल कहाँ है कि 'ज़फ़र'
दाँत हैं ये तो दिखाने के लिए