उर्दू शायरी · ग़ज़ल

poshida jab ho raaz ki munh mein zaban na ho

पोशीदा जब हो राज़ कि मुँह में ज़बाँ न हो

پوشیدہ جب ہو راز کہ منہ میں زباں نہ ہو

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पोशीदा जब हो राज़ कि मुँह में ज़बाँ न हो
हम बात भी करें तो बग़ैर-अज़-फ़ुग़ाँ न हो

ले जाएँ आह मुझ को मिरी बद-गुमानियाँ
ज़ालिम वहाँ कि तेरा पता भी जहाँ न हो

ज़ाहिद अज़ाब-ए-इश्क़-ए-सनम लुत्फ़-ए-हक़ समझ
या'नी अज़ाब हम को यहाँ हो वहाँ न हो

नैरंगी-ए-चमन जो मुझे याद आ गई
गुल पर हुआ गुमान कि बर्ग-ए-ख़िज़ाँ न हो

तुम को मज़ा न देगी कभी दास्तान-ए-इश्क़
जब तक हमारे मुँह से ये क़िस्सा बयाँ न हो

नाक़े को क़ैस क्या न लगा लाए राह पर
लैला का राज़दार अगर सारबाँ न हो

तोहमत किसी को ज़ुल्म की ऐ 'दाग़' क्यों लगाएँ
शिकवा बुतों से क्या जो ख़ुदा मेहरबाँ न हो