उर्दू शायरी · ग़ज़ल

phul ka chehra bhi ab to qatra-e-shabnam lage

फूल का चेहरा भी अब तो क़तरा-ए-शबनम लगे

پھول کا چہرہ بھی اب تو قطرۂ شبنم لگے

शायर: M Ali8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फूल का चेहरा भी अब तो क़तरा-ए-शबनम लगे
जाने क्यूँ हर एक मौसम दर्द का मौसम लगे

ताज शरमाते थे जिस से कज-कुलाही वो कहाँ
हर जगह सज्दा रवा है हर जगह सर ख़म लगे

जाने क्या क्या लिख दिया चेहरे पे गर्द-ए-वक़्त ने
आइना देखा कभी तो अजनबी से हम लगे

तेरे होंटों के लिए लाऊँ कहाँ से क़हक़हे
इक तबस्सुम के लिए ये ज़िंदगी भी कम लगे

ज़र्द मंज़र देखने की आँखें 'आदी हो गईं
ख़ाक है रंग-ए-बहाराँ हर ख़ुशी इक ग़म लगे

ख़ुश्क आँखों में भी सौ तूफ़ान हैं सोए हुए
पत्थरों जैसी ज़मीं अन्दर बहुत ही नम लगे

बन गई है दर्द की बस्ती जुलूसों का नगर
दिल-नवाज़ी गुम हुई हर आदमी परचम लगे

अपने साए से भी डर जाने का मौसम आ गया
दिल की सरगोशी भी जैसे ऐ 'अली' इक बम लगे