उर्दू शायरी · ग़ज़ल

phul galon ko to aankhon ko kanwal kahta raha

फूल गालों को तो आँखों को कँवल कहता रहा

پھول گالوں کو تو آنکھوں کو کنول کہتا رہا

शायर: Iftikhar Naseem6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फूल गालों को तो आँखों को कँवल कहता रहा
जंग थी बाहर गली में मैं ग़ज़ल कहता रहा

मर रहे थे रफ़्ता रफ़्ता मेरे सब महसूर दोस्त
और मैं मस्जिद में रब्ब-ए-लम-यज़ल कहता रहा

शायरी की और नज़र-अंदाज़ की बच्चों की भूक
चाँद को रोटी का मैं नेमुल-बदल कहता रहा

आ पड़ा दिल पर मिरे आख़िर मिरा कोहना वजूद
रोज़ दस्तक दे के इस घर से निकल कहता रहा

आ गई आख़िर मिरे सर पर मिरे दुश्मन की फ़ौज
मैं भी तय्यारी करूँगा आज-कल कहता रहा

तय न कर पाया कभी अपना तशख़्ख़ुस ही 'नसीम'
आब-ए-ज़मज़म को हमेशा गंगा-जल कहता रहा