उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pesh-e-nazar nahin hai jo kuchh din se ru-e-dost

पेश-ए-नज़र नहीं है जो कुछ दिन से रू-ए-दोस्त

پیش نظر نہیں ہے جو کچھ دن سے روئے دوست

शायर: Jaleel Qidwai12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पेश-ए-नज़र नहीं है जो कुछ दिन से रू-ए-दोस्त
बेचैन कर रही है बहुत आरज़ू-ए-दोस्त

आँखों से दूर हो भी गए वो तो क्या हुआ
दिल में बसी हुई है तमन्ना-ए-रू-ए-दोस्त

गुलज़ार-ए-आशिक़ी की फ़ज़ा पुर-बहार है
फैला हुआ है चार तरफ़ रंग-ओ-बू-ए-दोस्त

कानों में आ रही है बराबर वही सदा
भूली नहीं है दिल को मिरे गुफ़्तुगू-ए-दोस्त

गूँजी हुई फ़ज़ा में है वो सौत-ए-जाँ-नवाज़
अल्लह रे लुत्फ़-ओ-सोज़-ए-नवा-ए-गुलू-ए-दोस्त

हैं मुनअ'किस तमाम नुक़ूश-ए-जमाल-ए-यार
दिल एक आइना है कि है रू-ब-रू-ए-दोस्त

हर दम बहार जल्वा-ए-जानाँ है नौ-ब-नौ
हैराँ हूँ देख देख के जोश-ए-नुमू-ए-दोस्त

पर्वा नहीं जो राह-ए-मोहब्बत में सर गया
हम जान दे के हो तो गए सुर्ख़-रू-ए-दोस्त

इक़रार में तो ख़ैर नुमायाँ था लुत्फ़-ए-यार
इंकार में भी हाए वो तर्ज़-ए-निकू-ए-दोस्त

दीवानगी में हम ने ये दिल से कहा था कल
तुझ को क़सम है आज से देखे जो रू-ए-दोस्त

लेकिन जुनून-ए-शौक़ की आई जो एक लहर
मस्ताना-वार चल ही दिए हम ब-कू-ए-दोस्त

ज़ाहिद फ़रेब-ए-साग़र-ए-कौसर 'जलील' को
जो कर चुका है बै'अत-ए-जाम-ओ-सुबू-ए-दोस्त