उर्दू शायरी · ग़ज़ल

patton ke TuTne ki sada der tak chali

पत्तों के टूटने की सदा देर तक चली

پتوں کے ٹوٹنے کی صدا دیر تک چلی

शायर: Qaisarul Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पत्तों के टूटने की सदा देर तक चली
कल दश्त-ए-जिस्म-ओ-जाँ में हवा देर तक चली

रौशन रहीं निगार-ए-हुनर की हथेलियाँ
अपनी दुकान-ए-रंग-ए-हिना देर तक चली

जब नींद उड़ गई तो सितारे बहुत खुले
जब रात घट गई तो हवा देर तक चली

हम बंद कर के सो गए ख़ुशबू की खिड़कियाँ
सुनते हैं रात बाद-ए-सबा देर तक चली

महफ़िल में चल पड़ी थी हमारे जुनूँ की बात
फिर दास्तान-ए-चाक-ए-क़बा देर तक चली

साहिल पे आ के डूब गईं सब अक़ीदतें
गहरे समुंदरों में दुआ देर तक चली