उर्दू शायरी · ग़ज़ल

patte nahin kahin hari shaKH-e-shajar nahin

पत्ते नहीं कहीं हरी शाख़-ए-शजर नहीं

پتے نہیں کہیں ہری شاخ شجر نہیں

शायर: Ghalib Ahmad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पत्ते नहीं कहीं हरी शाख़-ए-शजर नहीं
इस शहर में बहार की कोई ख़बर नहीं

रंग-ए-ख़िज़ाँ में लाख मिलाऊँ दिलों के रंग
मौज-ए-शराब-ओ-शे'र में कोई असर नहीं

डूबे पड़े हैं क़ुल्ज़ुम-ए-ख़्वाब-ओ-ख़याल में
मौज-ए-रवाँ कहाँ है किसी को ख़बर नहीं

दरिया में मौज बन के कहाँ तक रहे कोई
मौज-ए-रवाँ ब-सूरत-ए-दीवार-ओ-दर नहीं

अब मंज़िल-ए-वजूद नहीं दिल की काएनात
इस घर में एक मैं हूँ कोई बाम पर नहीं

तू राहत-ए-वजूद है तू रूह-ए-काएनात
इस घर में तू नहीं है तो ये मेरा घर नहीं

दश्त-ए-तलब है ख़त्म यहाँ नाक़ा-ए-निगाह
ये वो ज़मीं है जिस में तुम्हारा गुज़र नहीं