उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pata nahin chalne deta aur shamil ho jata hai

पता नहीं चलने देता और शामिल हो जाता है

پتہ نہیں چلنے دیتا اور شامل ہو جاتا ہے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पता नहीं चलने देता और शामिल हो जाता है
जब कोई चुपके से दिल में दाख़िल हो जाता है

ख़ुद से मिलना भी ना-मुम्किन हो जाता है अक्सर
कोई तो है जो दरमियान में हाइल हो जाता है

लेने के देने पड़ जाते हैं ये खेल है ऐसा
यक दम अच्छा भला सख़ी भी साइल हो जाता है

हर शय खो देते हैं और कुछ भी नहीं बचता बाक़ी
फिर भी लगता है सारा कुछ हासिल हो जाता है

आँखें और तरफ़ को खींचती होती हैं उस लम्हे
लेकिन दिल एक और तरफ़ ही माइल हो जाता है

कोई किनारा है जो कभी डुबो देता है कश्ती
एक भँवर है जहाँ सफ़ीना साहिल हो जाता है

उसे भी याद नहीं आता है एक चाहने वाला
दिल भी मोहब्बत करते करते ग़ाफ़िल हो जाता है

ऐसे लगता है कि हवा भी रोक रखी हो उस ने
बैठे बैठे साँस भी लेना मुश्किल हो जाता है

पेश-रफ़्त की कोशिश में तो लगे रहते हैं 'ज़फ़र' हम
और असर पहले वाला भी ज़ाइल हो जाता है