उर्दू शायरी · ग़ज़ल

partaw-e-ruKH se tere aalam daraKHshan ho gaya

परतव-ए-रुख़ से तिरे 'आलम दरख़्शाँ हो गया

پرتو رخ سے ترے عالم درخشاں ہو گیا

शायर: Rafique Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

परतव-ए-रुख़ से तिरे 'आलम दरख़्शाँ हो गया
दाग़-ए-दिल तेरी बदौलत मेहर-ए-ताबाँ हो गया

आ गया दिल में तसव्वुर उस रुख़-ए-पुर-नूर का
मिट गईं तारीकियाँ घर में चराग़ाँ हो गया

उस की रहमत ने मुझे फिर ले लिया आग़ोश में
जब ख़ताओं पर मैं अपनी ख़ुद पशेमाँ हो गया

उन के अल्ताफ़-ओ-करम से दिन हमारे फिर गए
मुश्किलें हल हो गईं हर काम आसाँ हो गया

मैं समझता था फ़क़त दैर-ओ-हरम हैं उस के घर
अपने दिल में जब उसे पाया तो हैराँ हो गया

एक मुश्त-ए-ख़ाक का अल्लाहु-अकबर ये शरफ़
बन गया मुख़्तार-ए-कुल महबूब-ए-यज़्दाँ हो गया

जब न पाया उस ने दुनिया में कोई मुझ सा 'रफ़ीक़'
किस क़दर नादिम हुआ दिल में पशेमाँ हो गया