उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pareshan hun main us bhai ke mare

परेशाँ हूँ मैं उस भाई के मारे

پریشاں ہوں میں اس بھائی کے مارے

शायर: Tahir Saood Kiratpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

परेशाँ हूँ मैं उस भाई के मारे
कि जो पागल है हरजाई के मारे

ज़माने ने बदल डाली रिवायत
पड़े हैं धूप में भाई के मारे

बिछड़ते जब किसी को देखता हूँ
तड़प उठता हूँ माँ-जाई के मारे

मुझे अपना ख़लीफ़ा मानते हैं
सफ़-ए-अव्वल की तन्हाई के मारे

बता तो दें उसे औक़ात उस की
मगर हम चुप हैं दानाई के मारे

वहाँ क्यूँकर न फ़ाक़े हों मुक़द्दर
जहाँ गूँगे हों महँगाई के मारे

रहा यूँही तो कल मुमकिन है 'ताहिर'
तमांचे झूट सच्चाई के मारे