उर्दू शायरी · ग़ज़ल

parde mein yun to phul khila ehtiyat ka

पर्दे में यूँ तो फूल खिला एहतियात का

پردے میں یوں تو پھول کھلا احتیاط کا

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पर्दे में यूँ तो फूल खिला एहतियात का
चर्चा है शहर भर में उसी वारदात का

फिर आग से गुज़र के मिटी है सियाह भूक
आटा तनूर में नज़र आया परात का

मोहलत ही दी न अपने दिल-ए-शर-पसंद ने
परहेज़ था उसे तो बहुत छूत-छात का

मोड़ा जो चेहरा साथ वो सारा ही मुड़ गया
जैसे बना हुआ था किसी सख़्त धात का

दो चार हाथ खेलिए खुल कर बस अपने साथ
ऐसा नहीं ख़याल हमें जीत मात का

सब रौशनाई उड़ गई शब भर में क्या लिखें
ढकना खुला रहा कहीं दिल की दवात का

घर बेच कर ही अब के चुकाया है क़र्ज़-ए-ग़म
हम बोझ कब सहार सके उस की बात का

कुछ रेत फैलती हुई सहरा-ए-सब्र की
कुछ ज़ोर टूटता हुआ दरिया-ए-ज़ात का

आँखों से आते जाते उलझता है ऐ 'ज़फ़र'
दीवार पर लिखा हुआ कुछ उस के हात का