उर्दू शायरी · ग़ज़ल

parda tumhaare ruKH se haTana paDa mujhe

पर्दा तुम्हारे रुख़ से हटाना पड़ा मुझे

پردہ تمہارے رخ سے ہٹانا پڑا مجھے

शायर: Faisal Imtiyaz Khan5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पर्दा तुम्हारे रुख़ से हटाना पड़ा मुझे
यूँ अपनी हसरतों को जगाना पड़ा मुझे

मैं ने तो खेल खेल में तोड़ा था उस का दिल
फिर सारी उम्र उस को मनाना पड़ा मुझे

जब इश्क़ इक ग़रीब से मुझ को हुआ तो फिर
दिल का जो मोल था वो घटाना पड़ा मुझे

उस ने कहा मैं जी नहीं पाऊँगी तेरे बिन
इस वास्ते वो रिश्ता निभाना पड़ा मुझे

'फ़ैसल' वो सारे लोग थे बहरे इसी लिए
ख़ामोश रह के शोर मचाना पड़ा मुझे