उर्दू शायरी · ग़ज़ल

parda chehre se haTae to ghazal ho jae

पर्दा चेहरे से हटाए तो ग़ज़ल हो जाए

پردہ چہرے سے ہٹائے تو غزل ہو جائے

शायर: Chandrabhan Khayal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पर्दा चेहरे से हटाए तो ग़ज़ल हो जाए
ज़िंदगी सामने आए तो ग़ज़ल हो जाए

सर्द सड़कों पे सिसकते हुए सन्नाटों का
दर्द जब दिल में समाए तो ग़ज़ल हो जाए

सोज़ हर लफ़्ज़ के सीने में निहाँ है अब भी
ख़ामुशी साज़ उठाए तो ग़ज़ल हो जाए

शहर-ए-एहसास अगर नर्म लब-ओ-लहजे में
दास्ताँ अपनी सुनाए तो ग़ज़ल हो जाए

दिन के हंगामों में गुम-कर्दा हर इक फ़िक्र मिरी
शब की आग़ोश में आए तो ग़ज़ल हो जाए

कब से बैठा हूँ ख़यालात का ख़ेमा ताने
कर्ब-ए-तख़्लीक़ सताए तो ग़ज़ल हो जाए

शाम-ए-ग़म जाम-ब-कफ़ है तो इस 'आलम में 'ख़याल'
होश भी हाथ मिलाए तो ग़ज़ल हो जाए