उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chilchilati dhup sar par aur tanha aadmi

चिलचिलाती धूप सर पर और तन्हा आदमी

چلچلاتی دھوپ سر پر اور تنہا آدمی

शायर: Chandrabhan Khayal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चिलचिलाती धूप सर पर और तन्हा आदमी
आह ये ख़ामोश पत्थर और तन्हा आदमी

जिस तरह इक बर्फ़ के टीले पे जलती हो चिता
ये पिघलता मोम सा घर और तन्हा आदमी

इस हिसार-ए-ख़ामुशी में बरसर-ए-पैकार हैं
तेज़ आवाज़ों के लश्कर और तन्हा आदमी

क्या उसी का नाम है रा'नाई-ए-बज़्म-ए-हयात
तंग कमरा सर्द बिस्तर और तन्हा आदमी

किस तरह आबाद होगी दिल की सूनी काएनात
डूबते मजरूह मंज़र और तन्हा आदमी

हाए उन बे-कार ज़ेहनों की घनी परछाइयाँ
उफ़ ये सन्नाटे का अजगर और तन्हा आदमी

रात के नंगे बदन से ख़्वाहिशों की छेड़-छाड़
हर-घड़ी अंजाम का डर और तन्हा आदमी