उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pahli si dil ko KHwahish-e-hijrat nahin rahi

पहली सी दिल को ख़्वाहिश-ए-हिजरत नहीं रही

پہلی سی دل کو خواہش ہجرت نہیں رہی

शायर: Aabid Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पहली सी दिल को ख़्वाहिश-ए-हिजरत नहीं रही
क्या ऐ ज़मीं हमारी ज़रूरत नहीं रही

आँगन में सारी रात बरसती रही घटा
दीवार घर की कोई सलामत नहीं रही

युंही नहीं इरादा-ए-पहलू-तही कि अब
उन से निबाह करने की सूरत नहीं रही

पत्ते हैं ख़ुश्क फिर भी शजर से हैं मुंसलिक
क्या कीजिए हवा की इनायत नहीं रही

दरिया में लाख मौजें रहीं सर-ब-कफ़ मगर
कच्चे घरों को अब कोई वहशत नहीं रही

गलियों में फिर से फ़र्श-ए-लहू बिछ गया तमाम
इंसाँ में आज-कल के शराफ़त नहीं रही