उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pahle zara muhasba-e-zat bhi to ho

पहले ज़रा मुहासबा-ए-ज़ात भी तो हो

پہلے ذرا محاسبۂ ذات بھی تو ہو

शायर: Qaisarul Jafri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पहले ज़रा मुहासबा-ए-ज़ात भी तो हो
दुनिया पड़ी है घर से शुरूआ'त भी तो हो

समझे हैं सब अना के धुँदलके को रौशनी
शमएँ कहाँ जलाऊँ कहीं रात भी तो हो

पिन्हाँ है आँसुओं में सुराग़-ए-शगुफ़्त-ए-गुल
सहरा-ए-बे-ज़मीर में बरसात भी तो हो

इक मसअले के बा'द नया मसअला है रोज़
कुछ मो'तबर ये गर्दिश-ए-हालात भी तो हो

चेहरे से दिल का हाल पढ़ें और रो भी लें
जिस से मिले हैं उस से मुलाक़ात भी तो हो

मुश्किल नहीं हवाओं में जलने लगें चराग़
शब-ज़ाद रास्तों में तिरा साथ भी तो हो

मैं तब्सिरा करूँ न ख़ुदा की ज़मीन पर
ठोकर लगे बिना गुज़र-औक़ात भी तो हो

लम्हों की मुट्ठियों में है सदियों की रौशनी
लेकिन नज़र में वक़्त की औक़ात भी तो हो