उर्दू शायरी · ग़ज़ल

paDhai karne ke hi darmiyan khinchti hai

पढ़ाई करने के ही दरमियान खींचती है

پڑھائی کرنے کے ہی درمیان کھینچتی ہے

शायर: Ghalib Duraib5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पढ़ाई करने के ही दरमियान खींचती है
कभी कभी तो वो लड़की यूँ ध्यान खींचती है

वो बैठती है दरीचे में रात होते ही
और उस के बा'द सितारों के कान खींचती है

हज़ार जान भी क़ुर्बान शाहज़ादी पर
कि जिस अदा से वो मुझ पर कमान खींचती है

यूँ खींचते हैं मुझे तेरे झुमके अपनी तरफ़
किसी नमाज़ी को जैसे अज़ान खींचती है

कलेजे उन के चबाती है बा'द में वो 'दुरैब'
कि वाइ'ज़ों की वो पहले ज़बान खींचती है