उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pata hun sahl zist ke mushkil safar ko main

पाता हूँ सहल ज़ीस्त के मुश्किल सफ़र को मैं

پاتا ہوں سہل زیست کے مشکل سفر کو میں

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पाता हूँ सहल ज़ीस्त के मुश्किल सफ़र को मैं
क्यों कर दुआ न दूँ बुत-ए-दीवाना-गर को मैं

छोटी सी अपनी बात तो अफ़्साना बन गई
जब बज़्म में छुपा न सका चश्म-ए-तर को मैं

एक इक क़दम पे झुकता रहा है सर-ए-नियाज़
मंज़िल ही अपनी समझा तिरी रहगुज़र को मैं

ऐ साग़र-ए-हयात तिरी तल्ख़ियाँ क़ुबूल
साक़ी को साथ पाऊँ जो लुत्फ़-ए-नज़र को मैं

दम भर रुका जो इश्क़ की मंज़िल में खो गया
एक इक से पूछता हूँ कि जाऊँ किधर को मैं

फिर बे-ख़ुदी से होश की जानिब हूँ बढ़ रहा
फिर ढूँढता हूँ आज तुम्हारी नज़र को मैं

यूँ छेड़ता हूँ पीरी में क़िस्से शबाब के
फिर ढूँढता हूँ राख में गोया शरर को मैं

आए न वो 'हबीब' न दिल की कली खिली
फिर क्यों न शाम-ए-ग़म कहूँ ऐसी सहर को मैं