उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pas mein ruh-e-wafa ho jaise

पास में रूह-ए-वफ़ा हो जैसे

پاس میں روح وفا ہو جیسے

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पास में रूह-ए-वफ़ा हो जैसे
दिल मिरा जलता दिया हो जैसे

इस तरह जीता हूँ मैं तेरे बग़ैर
ज़िंदगी एक सज़ा हो जैसे

लब पे यूँ नाम तिरा आता है
आख़िर-ए-शब की दुआ हो जैसे

दिल मिरा तोड़ा है हँसते हँसते
ये तिरा अहद-ए-वफ़ा हो जैसे

यूँ तेरी मस्त नज़र उठती है
दर मय-ख़ाना खुला हो जैसे

पल में मुरझा के गिरा शाख़ से फूल
मुस्कुराने की सज़ा हो जैसे

ग़म मिला तेरा लिपट कर मुझ से
यार-ए-देरीना मिला हो जैसे

उफ़ ये आलम तिरी अंगड़ाई का
गुल हो और मौज-ए-सबा हो जैसे

दिल में आई है तिरी याद 'हबीब'
शाख़ में फूल खिला हो जैसे