उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pas hone bhi na de honTh bhigone bhi na de

पास होने भी न दे होंठ भिगोने भी न दे

پاس ہونے بھی نہ دے ہونٹھ بھگونے بھی نہ دے

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पास होने भी न दे होंठ भिगोने भी न दे
शोर करता हुआ दरिया मुझे सोने भी न दे

बात को एक तरफ़ तो वो लगाए आ कर
कि न होने भी न दे और मुझे होने भी न दे

ढूँढ ही लेता है रू-पोश जहाँ हो जाऊँ
वो मुझे इतने बड़े शह्र में खोने भी न दे

या'नी तय्यार भी रक्खे वो मोहब्बत की ज़मीं
और फिर बीज मुलाक़ात का बोने भी न दे

कहीं यकताई भी रहने नहीं देता वो कोई
और कोई चीज़ किसी शय में समोने भी न दे

बारिशों को भी अलग रोक रखा है और अब
दिल की दीवार पे लिक्खा हुआ धोने भी न दे

पानियों में कोई लहर ऐसी भी शामिल है कि जो
कश्ती-ए-ख़्वाब को ता-सुब्ह डुबोने भी न दे

क्या कहें ख़्वार हुए किस की तमन्ना में 'ज़फ़र'
कि ज़बरदस्त है मारे भी वो रोने भी न दे