उर्दू शायरी · ग़ज़ल

panw kisi shor mein na shar mein khule

पाँव किसी शोर में न शर में खुले

پاؤں کسی شور میں نہ شر میں کھلے

शायर: Yasir Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पाँव किसी शोर में न शर में खुले
ना'रा-ए-ज़ंजीर की ज़बर में खुले

हाथ परिंदे जो फड़फड़ाए बहुत
तल्ख़-कलामी-ए-ख़ुश्क-ओ-तर में खुले

नींद के जंगल थे ख़्वाब-गाह में गुम
दश्त से लिपटे हुए नगर में खुले

दिल तो किसी मुस्तक़र की मौज में था
दाग़ मगर दामन-ए-सफ़र में खुले

माथा सजाऊँ सजीले पात से मैं
ताब-ए-सितारा जो बर्ग-ए-तर में खुले

जिस्म लबों तक बहुत रसीद हुआ
शाख़चों के ज़ाइक़े समर में खुले

चिट्ठी बराए फ़रोग़-ए-रंग समझ
मुट्ठी अगर दस्तक-ए-सहर में खुले