उर्दू शायरी · ग़ज़ल

oDh kar jo barf ka kambal gaya

ओढ़ कर जो बर्फ़ का कम्बल गया

اوڑھ کر جو برف کا کمبل گیا

शायर: Ubaid Najibabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ओढ़ कर जो बर्फ़ का कम्बल गया
आग से वो शख़्स कैसे जल गया

आबला-पाई ने हिम्मत तोड़ दी
फिर मुसाफ़िर अपने सर के बल गया

कर रही है जो बग़ावत ये हवा
आशियाँ पंछी का उस को खल गया

जिस्म ज़ख़्मी तीरगी का हो गया
हाथ में ले कर कोई मश'अल गया

हुस्न-ए-जानाँ का सफ़र सूरज सा है
सुब्ह चमका शाम को फिर ढल गया

हाथ मेरा कोई संदल तो नहीं
साँप कैसे आस्तीं में पल गया

प्यास ने आवाज़ दरिया को न दी
काम फिर से आँसुओं से चल गया