उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nikal paDa hai wo suraj nai tapan le kar

निकल पड़ा है वो सूरज नई तपन ले कर

نکل پڑا ہے وہ سورج نئی تپن لے کر

शायर: Saabir Usmani8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

निकल पड़ा है वो सूरज नई तपन ले कर
चला है ले के वो बर्छी कि फिर किरन ले कर

जो मेरे हिस्सा का बादल है क्यों नहीं बरसा
कहाँ मैं जाऊँ भला तन की ये अगन ले कर

हर एक शख़्स गया छोड़ कर मुझे आगे
कहीं मैं मर ही न जाऊँ यही जलन ले कर

फ़क़ीर हम हैं कि झोला उठा के चल देंगे
कहाँ कहाँ लिए फिरते रहेंगे धन ले कर

ज़मीं पे चाँद सितारे उतार लाएँगे
चले हैं दिल में हम अपने यही लगन ले कर

बिरह की मारी मैं बिरहन कहाँ से सुख भोगूँ
चुरा के मेरी ख़ुशी सब गया सजन ले कर

गुलाब होंटों में ज़ुल्फ़ों में यास में उन के
वो घर से निकले हैं ख़ुशबू-भरा बदन ले कर

दयार-ए-यार में हम छोड़ आए दिल 'साबिर'
कि लौट आए हैं अपना निढाल तन ले कर