उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nigah-e-muKHtasar se dastan tak baat ja pahunchi

निगाह-ए-मुख़्तसर से दास्ताँ तक बात जा पहुँची

نگاہ مختصر سے داستاں تک بات جا پہنچی

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

निगाह-ए-मुख़्तसर से दास्ताँ तक बात जा पहुँची
ख़ुदा जाने कहाँ से अब कहाँ तक बात जा पहुँची

निगाहों की ज़बाँ ने कह दिया जो कुछ न कहना था
दिल-ए-सोज़ाँ से जब अश्क-ए-रवाँ तक बात जा पहुँची

सँवर उट्ठी है क्या ज़ुल्फ़-ए-ज़मीं अब दस्त-ए-इंसाँ से
कि माह-ओ-मुश्तरी-ओ-आसमाँ तक बात जा पहुँची

हुआ तो फ़ैसला दिल का इशारों में कुनाएँ में
कहाँ वो लुत्फ़ जब लफ़्ज़-ए-बयाँ तक बात जा पहुँची

बला से साज़-ए-दिल टूटे सदा लेकिन न पैदा हो
हुई रुस्वा मोहब्बत जब फ़ुग़ाँ तक बात जा पहुँची

गई शायद जवानी और गया अंदाज़-ए-जुरअत भी
कि अब अंदेशा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ तक बात जा पहुँची

कभी गुलशन में अपना भी नशेमन था चमन वालो
ख़ुदा जाने ये क्यों बर्क़-ए-तपाँ तक बात जा पहुँची

नज़र बे-बाक दिल बेबाक क्या पर्वा 'हबीब' उस की
यहाँ तक बात जा पहुँची वहाँ तक बात जा पहुँची