उर्दू शायरी · ग़ज़ल

naya suKHan nae tarz-e-suKHan mein rakh diya hai

नया सुख़न नए तर्ज़-ए-सुख़न में रख दिया है

نیا سخن نئے طرز سخن میں رکھ دیا ہے

शायर: Faiz Khalilabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नया सुख़न नए तर्ज़-ए-सुख़न में रख दिया है
जो बे-वतन थे उन्हें भी वतन में रख दिया है

हमारी आँखों की लज़्ज़त का ध्यान रखते हुए
किसी का अक्स किसी के बदन में रख दिया है

मैं जिस ख़ुशी के तआ'क़ुब में था उसी ने मुझे
उदासियों के नए पैरहन में रख दिया है

वो रंग जिस पे छिड़कती है जान हर तितली
मिरे ख़ुदा ने मिरे आचरन में रख दिया है

सभी ने अपनी सियासत के ख़्वाब का मलबा
हमारी आँखों के संसद भवन में रख दिया है

लबों से अपने तबस्सुम निचोड़ कर उस ने
कई गुलों को अलग बाँकपन में रख दिया है